Friday, 20 June 2014

Chapter 1 ; Verse 46 ; Bhagavad Gita

TEXT 46
sanjaya uvaca
evam uktvarjunah sankhye
rathopastha upavisat
visrjya sa-saram capam
soka-samvigna-manasah
SYNONYMS
sanjayah--Sanjaya; uvaca--said; evam--thus; uktva--saying;arjunah--Arjuna; sankhye--in the battlefield; ratha--chariot; upasthe--situated on; upavisat--sat down again; visrjya--keeping aside; sa-saram--along with arrows; capam--the bow; soka--by lamentation; samvigna--distressed; manasah--within the mind.
TRANSLATION
Sanjaya said: Arjuna, having thus spoken on the battlefield, cast aside his bow and arrows and sat down on the chariot, his mind overwhelmed with grief.
PURPORT
While observing the situation of his enemy, Arjuna stood up on the chariot, but he was so afflicted with lamentation that he sat down again, setting aside his bow and arrows. Such a kind and soft-hearted person, in the devotional service of the Lord, is fit to receive self-knowledge.

Thus end the Bhaktivedanta Purports to the First Chapter of theSrimad Bhagavad-gita in the matter of Observing the Armies on the Battlefield of Kuruksetra.

1 comment:

  1. अर्जुन: कर्म की जड में कोई न कोई भावना होती है और भावना की जड में कोई रिशता होता है। इसलिए अगर मनुष्य अपने सारे ऱिशते तोड देगा और अपनी भावना का त्याग कर देगा तो कर्म किसके लिए करेगा?

    कृष्ण: अपने धर्म के लिए। धर्म के लिए भावना की नहीं बल्कि अपने कर्तव्य के ‍ ज्ञान की आवश्यक्ता होती है।

    भगवद् गीता कर्तव्यों के ज्ञान के लिए तुमहारा मन बुद्धि तूं मुझ में लगा और अपने कर्तव्यों के अधिकार को अच्छी तरहसे निभा....!!!! कितने आश्चर्य की बात है हरेक मनुष्य के लिए माफ कीजिए ईश्वर के अंश छोटे से जीवके लिए भगवद् गीता के अनुसार वह पंच इन्द्रियो और छठ्ठे मन को आकर्षित करके स्वयं अपना शरीर भगवान कहते है मेरी ही माया द्वारा बना लेता है तो प्रश्न यह उठता है इतना काबिल ज्ञानी जीव जो यह सब आकर्षण से ही स्वयं भगवानकी माया द्वारा अपने लिए शरीर बना लेता है और फिर जीव ईश्वर को भूल के माया का ही होकर रहे जाता है...!!!! तो इसका सीधा सादा अर्थ निकला के ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन अमल सहज सुख राशी रुपी माया में मस्त रहोगे तो भूलने की बिमारी से ग्रस्त रहोगे और अपने अंश को ईश्वर में मिला लोगे तो जो थोडा सा आकर्षित करके जीते हो वह माया पूरी की पूरी तुम्हारी मतलब ईश्वर की क्योकि दो है का जो धोखा इससे बाहर निकल कर एक के रंग में रंगना ईश्वर तत्व् का ज्ञान है। अभ्यास अभ्यास सांसोका अभ्यास सांसो पे पकड और प्राण पर अभ्यास प्राणों पर पकड और आत्म अभ्यास आत्म ज्ञान से आत्म कल्याण और आखरी आत्म कल्याणसे पूरे विश्व नहीं नही पूरै ब्रह्मांड का कल्याण ब्रह्मांड का कल्याण कैसे ? तो तेरी मेरी क्या सगाई तो तु भी आत्मा मै भी आत्मा जो तेरी जरुरते वह मेरी भी... यह पिंड ही तो ब्रह्मांड है। अपनी आत्मा रुपी चैतन्य महा प्रभु सांस कहतीे हैं के तु मेरे साथके अभ्यास और वैराग्य की तलवार से इस मायारूपी बंधन से बाहर आ।

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